"हैप्पी पटेल" रिव्यू: कॉमेडी कम, धैर्य की परीक्षा ज़्यादा
अगर आप यह सोचकर "हैप्पी पटेल" देखने जा रहे हैं कि फिल्म आपको खुश कर देगी, तो पहले ही बता दें कि यह खुशी से ज्यादा आपकी सहनशक्ति की परीक्षा ले सकती है।
फिल्म शुरू होने के कुछ ही मिनटों बाद मन में सवाल उठने लगता है, "क्या यह सच में आमिर खान प्रोडक्शंस की फिल्म है?" इंटरवल तक पहुंचते-पहुंचते कहानी और प्रस्तुति दर्शकों को उलझन में डाल सकती है।
कहानी
कहानी आगे बढ़ने के बजाय खिंचती हुई महसूस होती है। कई दृश्यों के बाद दर्शक यही सोचते रह जाते हैं कि आखिर फिल्म में चल क्या रहा है।
कुछ जगहों पर संवादों का आशय समझने में सबटाइटल्स काफी मदद करते हैं, क्योंकि कई बार हास्य का प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ पाता।
अभिनय
कलाकारों का प्रदर्शन अपेक्षित प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं दिखता। कई दृश्यों में भावनात्मक अभिव्यक्ति सीमित महसूस होती है, जिससे पात्रों से जुड़ाव कम हो जाता है।
कॉमेडी
फिल्म को कॉमेडी के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन हास्य के कई प्रयास दर्शकों पर अपेक्षित असर नहीं छोड़ पाते।
संवाद
कुछ संवाद साधारण और प्रभावहीन लगते हैं। कई जगह वे कहानी को मजबूत करने के बजाय कमजोर करते नजर आते हैं।
संगीत
गीत अचानक आते हैं और जल्दी समाप्त हो जाते हैं। फिल्म खत्म होने के बाद अधिकांश गाने याद नहीं रह पाते।
निर्देशन
निर्देशन में एकरूपता की कमी महसूस होती है। कई दृश्य आपस में स्वाभाविक रूप से जुड़े हुए नहीं लगते, जिससे फिल्म का प्रवाह प्रभावित होता है।
निष्कर्ष
यदि आपके पास कुछ खाली समय है, तो उसके उपयोग के लिए कई बेहतर विकल्प हो सकते हैं। यह फिल्म हर दर्शक की पसंद नहीं बन पाएगी और कई लोगों को यह अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती हुई महसूस हो सकती है।
कुल मिलाकर, "हैप्पी पटेल" एक ऐसी फिल्म है जो मनोरंजन से अधिक दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेती नजर आती है।
