अगर आप सोच रहे हैं कि “हैप्पी पटेल” देखकर दिमाग हैप्पी हो जाएगा तो भाईसाहब पहले ही बता दूँ – ये हैप्पी कम और नींद की गोली ज़्यादा है।
फिल्म शुरू होती है, और पहले 10 मिनट में ही लगता है कि “अरे, ये क्या वाकई आमिर खान प्रोडक्शन की मूवी है । और इंटरवल होते तक आप अगर एक बार भी एन्जॉय करते है तो आपको मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी।
कहाँ देखे – कहीं मत देखो कभी मत देखो (थिएटर में आज ही लगी है )
लगता है राजासाहब मूवी और हैप्पी पटेल में कॉम्पीटीशन है कि हर हफ्ते कौन बेहूदा फिल्म बनाता है।
बात करते है कहानी की : नही करनी चाहिए बात इस पर फिल्म आगे बढ़ती नहीं, बस घिसटती है, जैसे 2G नेटवर्क पर YouTube चल रहा हो। हर सीन के बाद यही सवाल – “ये क्या चल रहा है?”
कुछ जगह तो सबटाइटल के कारण ह्यूमर समझ आता है राइटर का वरना वो एक्टर्स का accsent लगता है
एक्टिंग – एक्टर्स ने पूरी कोशिश की है फिल्म को और खराब बनाने की।
ना खुशी, ना दुख, ना गुस्सा – बस करना है वाला चेहरा।
कॉमेडी – फिल्म को कॉमेडी बताया गया है, लेकिन हँसी सिर्फ एक ही जगह आती है – अपनी मूर्खता पे की देखने क्यों गया ।
डायलॉग – कुछ डायलॉग सुनकर ऐसा लगता है कि राइटर ने लिखा नहीं, बल्कि थका हुआ गूगल ट्रांसलेट यूज़ किया है।
एक सीन में तो मन करता है सबटाइटल बंद करके दिमाग भी बंद कर दूँ।
म्यूज़िक -गाने अचानक आते हैं, अचानक चले जाते हैं –
बिल्कुल आपकी एक्स की तरह।
ना याद रहते हैं, ना याद रखने लायक हैं।
डायरेक्शन -डायरेक्टर शायद खुद भी कन्फ्यूज़ था कि मूवी बना रहा है या टाइम पास कर रहा है। सीन्स जुड़े नहीं हैं, बस सस्ते फेविकोल से चिपकाए गए हैं।
सलाह -अगर आपके पास 2–3 घंटे फ्री हैं, तो
छत साफ कर लो
सो जाओ
या दीवार गिन लो
लेकिन “हैप्पी पटेल” मत देखो।
ये फिल्म नहीं, सब्र की परीक्षा है।।।
By- Vicky Chandani